बस एक बेटी और उसका सम्मान
एक बिटिया को जन्म देना क्या कम है? उसे गोद में उठाकर बड़ा करना, पढ़ाना, उसके सपनों को सींचना, अपनी कितनी ही इच्छाओं को पीछे रखकर उसके लिए थोड़ी-सी छाँव बचा लेना—क्या यह सब कम है?
विकास हुआ पर कई जगहों पर आज भी विक्षिप्ता दिख ही जाती है कई जगहों पर,
कहने को जिसके घर लड़का हो, उसके घर में कोई कमी नहीं होती। समाज भी तो यही जतलाता आया है। फिर उसी लड़के की शादी आते ही उसकी कीमत क्यों लगने लगती है? बेटा उनका होता है, फिर भी जैसे घर खाली होता है—उसे भरने
की ज़िम्मेदारी बिटिया के घर की हो जाती है।
कहते हैं, समाज प्रगति कर रहा है। मगर क्या सच में? क्या एक बच्ची को पालना, पढ़ाना, उसे अपने पैरों पर खड़ा करना और जीवन की ज़िम्मेदारियाँ समझाना कम है, जो उसकी विदाई के साथ अब भी हसरतों की पोटलियाँ, नोटों के बंडल और सोने की अशर्फ़ियाँ माँगना बाकी है?
देना गलत नहीं है। हर माँ-बाप अपनी सामर्थ्य और अपनी इच्छा से बेटी को कुछ देता है—कुछ कपड़े, कुछ गहने, कुछ छोटे-बड़े तोहफ़े; ऐसी चीज़ें जिनमें उनका प्यार दिखाई दे और जिन्हें देखकर बेटी को नए घर में भी अपनेपन का एहसास हो। और लगे की वो पराई नहीं है, देना गलत नहीं है पर मांगना अनुचित है...
माँ-बाप तो अक्सर अपनी सामर्थ्य से भी ज़्यादा दे देते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि बेटी को विदा करते समय उनके मन में कोई कमी न रह जाए। मगर फिर उनकी सामर्थ्य से ज़्यादा माँगना कैसे ठीक हो सकता है?
बेटी कोई कीमत नहीं, जिसे शादी के साथ चुकाया जाए। वह तो वह जीवन है जिसे माँ-बाप ने बरसों सँभालकर बड़ा किया है।
कब एक बेटी अपने घर से निकलकर किसी दूसरे के घर नहीं, अपने ही घर जाएगी? कब एक पिता बेटी की शादी के बाद कर्ज़ की किश्तें नहीं, उसकी हँसी गिनेगा?
और कब माँ बेटी को गहनों की पोटली से ज़्यादा अपने अनुभवों की पोटली देकर कहेगी—
“बेटी, घर बचाना… परिवार को वैसे ही सींचना जैसे मैंने सींचा है, मगर अपने आपको खोकर नहीं।”
“मांगत मांगत मान घटे, बिन मांगे मान बड़े।”
शायद विवाह का सबसे सुंदर उपहार वही होगा, जिसमें किसी ने कुछ माँगा ही न हो।
जहाँ बेटी अपने साथ दहेज़ नहीं, अपना बचपन, अपने सपने और अपने माँ-बाप का आशीर्वाद लेकर जाए।
और पिता की आँखों में विदाई का दुख तो हो, मगर यह डर नहीं कि उसने कुछ कम दे दिया।
बस इतना सुकून हो—
उसने बेटी को किसी को सौंपा नहीं,
उसे उसके हिस्से का जीवन जीने के लिए विदा किया है।
और काश, किसी दिन बेटी के आने पर कोई हाथ जोड़कर कह सके—
“स्वागत है हमारी बच्ची,
तुम्हारा अपने घर में।”
न कोई बोली हो,
न कोई हिसाब,
न कोई शर्त।
बस एक बेटी हो,
और उसके आने की खुशी।
शायद वह दिन आएगा।
धीरे-धीरे ही सही।
आख़िर किसी दिन
हमें यह सीखना ही होगा
कि बेटी घर में आती है—
कुछ लेकर नहीं।
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Bhut khoobb❤❤
ReplyDeleteSundar
ReplyDeleteKya baat hai!! 🥀❤
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