बस एक बेटी और उसका सम्मान
एक बिटिया को जन्म देना क्या कम है? उसे गोद में उठाकर बड़ा करना, पढ़ाना, उसके सपनों को सींचना, अपनी कितनी ही इच्छाओं को पीछे रखकर उसके लिए थोड़ी-सी छाँव बचा लेना—क्या यह सब कम है? विकास हुआ पर कई जगहों पर आज भी विक्षिप्ता दिख ही जाती है कई जगहों पर, कहने को जिसके घर लड़का हो, उसके घर में कोई कमी नहीं होती। समाज भी तो यही जतलाता आया है। फिर उसी लड़के की शादी आते ही उसकी कीमत क्यों लगने लगती है? बेटा उनका होता है, फिर भी जैसे घर खाली होता है—उसे भरने की ज़िम्मेदारी बिटिया के घर की हो जाती है। कहते हैं, समाज प्रगति कर रहा है। मगर क्या सच में? क्या एक बच्ची को पालना, पढ़ाना, उसे अपने पैरों पर खड़ा करना और जीवन की ज़िम्मेदारियाँ समझाना कम है, जो उसकी विदाई के साथ अब भी हसरतों की पोटलियाँ, नोटों के बंडल और सोने की अशर्फ़ियाँ माँगना बाकी है? देना गलत नहीं है। हर माँ-बाप अपनी सामर्थ्य और अपनी इच्छा से बेटी को कुछ देता है—कुछ कपड़े, कुछ गहने, कुछ छोटे-बड़े तोहफ़े; ऐसी चीज़ें जिनमें उनका प्यार दिखाई दे और जिन्हें देखकर बेटी को नए घर में भी अपनेपन का एहसास हो। और लगे की वो पराई नहीं है...