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पहाड़ी दीदी

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🌿 पहाड़ी दीदी ✍️ रूचि शर्मा बहुत दिन हो गए थे पहाड़ों वाले घर गए हुए।  शहर की भागदौड़ और शोर के बीच अब मन ज़्यादा   देर टिकता ही नहीं। जब भी मन थोड़ा भारी होता है, हम दोनों गाड़ी उठाते हैं और निकल पड़ते हैं अपने उस सुकून वाले पहाड़ों की ओर... वहाँ की हवा में ही जैसे एक अलग सी शांति होती है।कभी आसपास की जगहों पर घूम आते हैं, कभी किसी छोटे से ढाबे पर लोकल खाना खा लेते हैं, और कभी चुपचाप बैठकर किताब पढ़ते रहते हैं। इस बार भी हम ऐसे ही अचानक निकल पड़े थे।  दिन भर पहाड़ों में घूमने के बाद जब हम वापस लौट रहे थे, तभी रास्ते में एक जगह गाड़ी थोड़ी देर के लिए रोकी। शाम धीरे-धीरे उतर रही थी और पहाड़ी हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। तभी पीछे से एक आवाज़ आई — “सुनिये जी… क्या आप दोनों हमें नीचे तक छोड़ सकते हो? यहाँ से गाड़ी बहुत देर में आती है… हम काफी देर से खड़े हैं, घर भी जाना है, और घर जाते जाते रात तलक हो जाएगी ।” हमने पीछे मुड़कर देखा। एक पहाड़ी महिला पीछे खड़ी थीं और दूसरी हमसे बात कर रही थीं । उनके चेहरे पर हल्की थकान थी, लेकिन आँखों में एक सादगी भरी उम्मीद भी थी। अगर ...

“कुछ लोग बड़े हो गए…”

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पुराने दिन अक्सर बिना बुलाए याद आ जाया करते हैं। जब हम बच्चे थे — न कोई दिखावा, न कोई दूरी… बस एक ही छत के नीचे भरपूर प्यार, और गर्मी की छुट्टियों में भरपूर शोरगुल। एक कमरे में जगह कम पड़ जाती थी, पर हम बच्चों के बीच मोहब्बत कभी कम नहीं पड़ती थी। रात भर जागना, हँसी के ठहाके, और जिद — कि सब साथ ही सोएँगे। उसी तंग जगह में हमको खुशियाँ चौड़ी लगती थीं। लेकिन समय आगे बढ़ा। कुछ बच्चे बड़े हुए… और कुछ बहुत ज्यादा बड़े हो गए। अब वही लोग, जिनके साथ बिना जगह माँगे सो जाते थे, एक लड़की से —पूछते हैं, “मायके में रहने की जगह है? कमरे सब भर चुके हैं… तुम कहाँ सो पाओगी? अब क्या रात का खाना खाकर  फिर अपने घर वापिस जाओगी..” मैंने सहजता से हँसकर कहा, “घर में जगह की चिंता मत करो, मुझे तो आज भी बैठक में ज़मीन पर बिछे गद्दों पर सबके साथ सोना सबसे ज्यादा पसंद है। और अजीब बात ये है… जब मैं वहाँ सोती हूँ, सब अपने–अपने कमरों से निकलकर वहीं आ जाते हैं। चाय की चुस्कियाँ, पुरानी बातें, और वही पुराना घर फिर से जवान हो उठता है।” सच तो यह है— घर में जगह कम या ज्यादा होने का फैसला कमरों से नहीं, दिलों से होता है।...

रात और नज़म

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 कल रात एक नज़्म भूल बैठी फिर से  कल रात एक नज़्म भूल बैठी फिर से वही खुले आकाश के नीचे तारों की छांव में, धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रही थी तो कुछ बुद बूदा रही थी,  घर से एक जोरदार आवाज आई रात बहुत हो गई है कोई आया है मिलने,  पर मैं मन ही मन बहुत खुश थी कि मेरी एक और कविता एक और नज़्म पूरी हो रही थी,  घर आकर देखा तो कुछ दोस्तों का  ताना-बाना था, कुछ दोस्त यूं ही  अचानक आ गए थे चाय पर  दिल बहलाने,  देर रात मैंने कलम कागज़ निकाला  लिखने को वो खूबसूरत वो नज़म, पर याद करने पर भी याद नहीं आई वो मुझे, भूल बैठी वह अपनी खास नज़म खूब सोचा तब बस यह याद आया तारे थे आकाश थे और खुली हवा का झोंका, और बस कुछ और याद नहीं रहा,  कल देर रात भूल बैठी फिर अपनी वो ख़ास नज़म,   कल फिर से उसी जगह पर जाऊंगी क्या पता  कुछ भुला फिर से याद आ जाए,   अक्सर बचपन में यही कहा करते थे जहां कुछ भूल जाते थे उसी जगह जाकर याद किया करते थे, क्या पता मेरी वह प्यारी  नज़म मुझे भी उसी जगह फिर से याद आ जाये...  Insta id @Writerruchi_roohhh_053

कहानियाँ

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 कितनी ही कहानियाँ हमारे अंदर होती है और कितनी ही हमारे आसपास, उनमें से सबसे बेहतरीन कहानियाँ हमारे जेहन में छाप छोड़ जाती है और जब वो कहानियाँ लिखी जाती है तो कमाल ही होता है, पर साथ में कई अपनों के दर्द भी हमको छू जाते है और जब उनको लिखते है तो खुद की आँखों के किनारे भीग जाते है ...... मेरी कहानियों में बहुत कुछ है पर सच्चा है,  जो भी अनुभव किया सब लिखा क्यूंकि कई बार बहुत कुछ कहा नहीं जाता ना ही समझाया जा सकता है बस उसको अपने अंदर से सफ़ेद कागजों पर उडेल दिया जाता है. .......  Writerruchi_roohhh_053  बहुत कुछ लिखना अभी बाकि है मेरे दोस्त 

चाय की एक मेरी दोस्त ( Chaay or dost )

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"चाय की मेरी एक दोस्त"  सुबह की दूसरी चाय और किसी का इंतजार.... मुझको मेरी चाय पीने वाली दोस्त का इंतजार और उसको एक प्याली चाय का...    बड़ा ही अच्छा रिश्ता है हमारा  सिर्फ़ उसको ही नहीँ मुझको भी उसकी ज़रूरत है, घर को खुबसूरत बनाने में वो मेरा साथ जो देती है...  खुश रहती हूं मैं जब वह कहती है दीदी मुझको आपके यहां बहुत अच्छा लगता है,  बस मानो मुझको क्या मिल गया,  उसको पता है मुझको सिलबट्टे की चटनी कितनी पसंद है बस कहना ही नहीं पड़ता जब खुद के लिए बनाती है मेरे लिए थोड़ा सा ले आती है इतना स्वाद तो मुझको मेरी मिक्सी की चटनी में भी नहीं आता जितना उसके सिलबट्टे की चटनी में आता है जब भी वह दरवाजे पर खटखट करती है मुझको खुशी मिल जाती है दीदी मैं आ गई राधे राधे और मेरा  अस्सलाम वालेकुम हम दोनों को ही बहुत अच्छा लगता है वह भी मुस्कुरा जाती है और मैं भी, यही हमारे कई फासले खत्म हो जाते हैं दीदी क्या क्या लिखती हो कुछ समझ नहीं आता पर शायद अच्छा लिखती होगी "मुझ पर भी कुछ लिखो ना" उसका यह अधिकार से कहना मेरे दिल को भा जाता है बस बस थोड़ा सा उसको और अच्छा लग ...

दो गिलसियां वाली चाय ( old couple story )

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एक के चेहरे पर मुस्कान है तो एक के चेहरे पर चिंता अम्मा के चेहरे पर झुंरिया के साथ मुस्कान इस बात की शहर से कोई आया उनके घर उनके हाथों की चाय पीने.... और बाबा के चेहरे पर चिंता इस बात की कोई उनकी पेंशन की चिंता दूर कर दे, उनकों कहीं से पता चला की अब घंटो लाइन में लगे बिना ही घर पर रहकर ही अब ऑनलाइन पेंशन का काम हो सकता है , एक अख़बार को हाथों में दबाकर पूछ रहे थे बाबू ज़ी कैसे पता करुँ..?? कहाँ जाऊं..?? आप पढ़े-लिखे साहब हो कुछ बताओ इस बारे में बाबा माथे पर बहुत सारी चिंताओं की लकीरों के साथ पूछ रहे और पीछे खड़ी थी अम्मा वो ख़ुश इस बात से थी की उनके यहाँ की चाय हमने पी थी, वो चाय बेशकीमती पैसों की थी उस चाय के आगे 5 star की चाय भी फीकी थी, अम्मा ने बनाई ही इतने प्यार से थी... थोड़ा सकुचा कर बोली वो चाय के कप नहीं है मंगवा दूं किसी दूकान से, मैने मुस्कुरा कर कहा अम्मा तुम किसमें पीती हो उसमें ही पिला दो, बेटा छोटी-छोटी स्टील की ग़लसीयां हैं पी लोगी.. अम्मा छोटी हैं तो दो लाना एक से काम नहीं चलेगा मेरा और ये सुन वो ख़ुश हो गई...  पर्दा हटा कर कमरे में चाय बनाने अंदर गई तो धीरे से पीछे से ...

"एक लापता यादों से भरा बैग "

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                            "एक लापता यादों से भरा बैग " आज परिवार के साथ कहीं बाहर खाना खाने गई थी, गई तो थी ख़ुशी का जशन मनाने पर लौटी ग़ुजरी यादों के साथ, यादें एक दूसरे से जुड़ी होती है और कई बार बेजान चीजें  भी यादों के भॅवर में ले जाती है कुछ ऐसा ही आज हुआ मेरे साथ.....  हम सब एक दूसरे से बातें कर रहे थे पर बार-बार मेरी नजर पास रखें एक "काले बैग" पर जा रही थी, मैं चुपके से उसे देख़ रही थी और बीच - बीच में सबकी बातों के साथ उनकी बातों में मैं भी हसीं का तड़का लगा रही थी... और चुपके से तिरछी निगाह के साथ  बार-बार उस बैग को भी देख रही थी, मन में एक विचार बार-बार आ रहा था यह अकेला क्यों है..??? किसका है..?? कोई दिख क्यों नहीं रहा इसके पास..?? बहुत सारे सवाल मन में चल रहे थे, बहुत देर हुई और और बेजान सा बैग चुप होकर भी मुझसे बहुत सी बातें कर रहा था और वो वार्तालाप सिर्फ उसके और मेरे बीच हो रही थी...  मैंने सबकी निगाहों से बचकर उस ब्लैक बैग को अपने बराबर वाली सीट पर ...