माँ का ननिहाल और वहाँ की यादे

 एक छोटा सा पारिवारि समारोह 
 कैसे कई पीढ़ियों को
 फिर से एक साथ बैठा देता है—

 यह कहानी याद दिलाती है कि
 रिश्ते दूरी से नहीं, अपनापन
 और स्नेह से जुड़े रहते हैं।
 एक समारोह… और कई
 पीढ़ियों का मिलना 


“रिश्ते दूर नहीं होते…
 बस

 मिलने के मौके कम हो

 जाते हैं।और एक स्नेहपूर्ण,

 सच्चा निमंत्रण कई पीढ़ियों

 को आपस में जोड़े रखता है..

पुरानी यादों, रिश्तों और कई पीढ़ियों को फिर से जोड़ देने के लिए।
“माँ की ननिहाल का आँगन” ऐसी ही एक भावनात्मक स्मृति है।


📝 रूचि शर्मा 

कभी-कभी एक छोटा सा समारोह

सिर्फ एक खुशी नहीं लाता…

वो कई पीढ़ियों को

एक ही जगह बैठा देता है।

कल मैं एक पारिवारिक समारोह में गई थी।

घर से निकलते समय किसी ने पूछा —

“कहाँ जा रही हो?”

मैंने मुस्कुराकर कहा —

“एक समारोह में एक नयी पीढ़ी का 

आगमन हुआ है ।”

फिर अगला सवाल आया —

“किसके यहाँ?”

अब असली कहानी यहीं से शुरू होती है।

मैंने रिश्ता समझाना शुरू किया —

“मेरी माँ की मौसी…

उनकी बेटी…

उनका बेटा…

और अब उस बेटे के घर बेटा हुआ है।”

मेरी बात सुनकर सामने वाला थोड़ा चौंक गया।

हल्की मुस्कान के साथ उसने कहा —

“इतना दूर का रिश्ता…

वहाँ भी जाती हो?”

मैं भी मुस्कुरा दी।

और बस इतना ही कहा —

“रिश्ते दूर कहाँ होते हैं…

बस मिलने के मौके कम हो जाते हैं।”

और सच कहूँ तो

सिर्फ यही रिश्ता नहीं है।

हमारे परिवार में ऐसे और भी कई रिश्ते हैं

जहाँ हर मुलाक़ात पर

बात वहीं से शुरू होती है

जहाँ पिछली बार खत्म हुई थी।

उसी पल महसूस हुआ —

रिश्ते दूरी से नहीं,

जुड़ाव से बनते हैं।

कई बार लोग पास रहकर भी दूर हो जाते हैं,

और कई बार दूर रहकर भी

दिल का रिश्ता बना रहता है।

असल बात तो “निमंत्रण के भाव” में होती है।

कहीं-कहीं बस औपचारिकता निभाई जाती है —

एक फॉरवर्ड मैसेज आ जाता है।

आओ तो ठीक,

ना आओ तो भी ठीक।

और कहीं-कहीं

इतने स्नेह से बुलाया जाता है

कि निमंत्रण के साथ

उनकी आत्मीयता भी चली आती है।

कल का समारोह भी ऐसा ही था।

दरअसल वो सिर्फ एक समारोह नहीं था।

वो मेरी माँ के ननिहाल से जुड़े

उन रिश्तों का मिलना था

जो समय के साथ

पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते जा रहे हैं।

मामा, मौसियाँ, उनके बच्चे,

फिर उनके बच्चे…

परिवार धीरे-धीरे

नई पीढ़ियों में फैलता जा रहा है।

उस घर की खुशी

कब सबकी खुशी बन गई,

शायद किसी को पता ही नहीं चला।

वहाँ पहुँचकर एक और सुखद बात हुई।

मुझे वो लोग भी मिले

जिनसे अक्सर फोन पर बातें होती थीं,

पर मुलाक़ात कम हो पाती थी।

        


   "परिवार समय के साथ छोटा नहीं होता,

मामा-मौसियों भाई बहन के घर बढ़ते बच्चों के साथ

वो पीढ़ी दर पीढ़ी और बड़ा होता जाता है।”



मिलते ही किसी ने कहा 

“अरे रूचि…

तुम बहुत अच्छा लिखने लगी हो।”

मैं थोड़ा चौंक गई।

मैंने हँसकर पूछा —

“सच में?

आप लोग पढ़ते भी हो?”

तभी किसी ने हँसते हुए कहा —

“हम छुपे रुस्तम हैं…

पढ़ते सब हैं, बताते कम हैं।”

सभी हँस पड़े।

फिर छोटी बहन ने  कहा —

“रूचि दी …

हमारे पुराने दिनों पर भी लिखना।”

मैंने पूछा —

“कौन से दिन?”

उन्होंने कहा —

“जब हम सब छुट्टियों में

पटपड़गंज आया करते थे।”

बस…

इतना सुनना था कि

यादों का एक दरवाज़ा खुल गया।

किसी ने कहा —

“याद है…

तब AC नहीं हुआ करते थे।”

दूसरे ने हँसते हुए कहा —

“और हम सब आँगन में

ज़मीन पर ही सो जाते थे।”

सच में…

हम एक-दो या पाँच लोग नहीं थे।

पूरा कुनबा हुआ करता था।

आँगन में बड़े-बड़े गद्दे बिछते थे।

कोई तकिया खींच लेता,

कोई अपनी जगह बदल लेता।

और फिर शुरू होती थीं

रात भर चलने वाली बातें।

किसी की हँसी,

किसी की शरारत,

किसी की डाँट…

और उन सबके बीच

गूँजती रहती थी

हमारे परिवार की हँसी।

उस पल लगा

जैसे समय थोड़ी देर के लिए

पीछे लौट आया हो।

मैंने मुस्कुराकर उनसे कहा —

“ठीक है…

उस कहानी पर भी लिखूँगी।”

फिर मज़ाक में जोड़ दिया —

“लेकिन जब लिख दूँ

तो बताना कैसा लगा।”

सबने हँसकर कहा —

“ज़रूर बताएँगे।”

पर अभी

उन ताज़ा मुलाक़ातों और यादों को

यहीं शब्दों में समेट लेती हूँ।

क्योंकि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं

जिन्हें समझाने में वक्त लगता है,

पर निभाने में नहीं।

उनमें अपनापन बहता है।

और शायद इसी वजह से

ऐसे समारोह सिर्फ एक घर की खुशी नहीं होते…

ये कई पीढ़ियों को

फिर से एक परिवार बना देते हैं।

और सच कहूँ तो

हम खुशनसीब हैं

कि हमारे रिश्तों का यह साथ

आज भी बना हुआ है…

और उम्मीद है

आने वाली पीढ़ियों तक

यूँ ही चलता रहेगा।

📝 रूचि शर्मा 

एक कोशिश यादों को शब्दों में सहेज लेने की ।

 
पोस्ट के अंत में आप सबके लिये एक सवाल —
क्या आपके परिवार में भी ऐसे समारोह होते हैं जहाँ कई पीढ़ियाँ एक साथ मिलती हैं?
क्या आपको भी बचपन की वो छुट्टियाँ याद हैं
जब पूरा कुनबा एक ही आँगन में सोता था?
आपके परिवार की सबसे प्यारी याद कौन-सी है?


Pariwaar 
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Mayka 
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Mausi 
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